व्यंग:शपथ लेते हैं हम आपके बच्चे को अफसर बना कर ही छोड़ेंगे!

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शाम के चार बजने को आये हैं। मार्च का महीना धूल उड़ाते हुए गाँव में प्रवेश कर चुका है, और उसी के साथ हर दस मिनट पर आ जाती हैं अलग अलग स्कूलों की बच्चों को लाने-ले जाने वाली गाड़ियां, जिन पर लगे भोंपू से स्कूल का प्रचार हो रहा है। स्टूडियो का बोल्तु कलाकार चार पंक्तियों में विद्यालय की प्रशंसा करते हुए बताता है कि “सेंट कबूतर इंटरनेशनल स्कूल” दुनिया का सबसे अच्छा स्कूल है, जिसमें पढ़ने वाले लड़के सीधे अफसर बन कर निकलते हैं।
भारत का हर मध्यमवर्गीय पिता अपने बच्चों को अफसर ही बनाना चाहता है, और प्राइवेट स्कूल इस बात की गारंटी देते हुए शपथ लेते हैं कि हम अफसर बना कर ही छोड़ेंगे। यह एक अलग किस्म का साम्यवाद आया है देश में। हालांकि असँख्य बार ऐसा देखा गया है कि सेंट कबूतर इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ कर निकले बच्चों ने उसी संस्था के चर्च में एक बोरा चावल ले कर….. छोड़िये भी!
गाड़ियों के भोंपू से प्रचार के बीच में गाने भी बजते हैं। दो गीत हर स्कूल के भोंपू में कॉमन हैं। एक “मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरा मोती” और दूसरा “कर चले हम फिदा जानो तन साथियों…” दोनों गीत मुझे कन्फ्यूज कर देते हैं। जब आवाज आती है कि “बैलों के गले मे जब घुंघरू जीवन का…” तो मैं समझ नहीं पाता कि वह बैल कौन है जिसके गले में घुंघरू बांध कर प्रिंसिपल जीवन का सङ्गीत सुन रहा है! बच्चा या अविभावक??
दूसरा गीत तो और अधिक कन्फ्यूज करता है। मैं चाह कर भी समझ नहीं पाता कि स्कूल में बच्चों को “टंटलेशन” पढ़ाने में जानो-तन फिदा करने की जरूरत क्यों पड़ती है। हमने एक दो प्रिंसिपलों से पूछा भी, पर मेरी शंका सुनते ही सब लघुशंका का बहाना कर के भाग गए। खैर…
मजेदार बात बस यह है कि जिस कलाकार ने ‘सेंट कबूतर स्कूल’ का कैसेट बनाया है उसी ने ‘बाबू बताशा लाल एकेडमी’ का भी बनाया है। वह दोनों के प्रचार में एक ही टोन से बात शुरू करता है, “मेरे प्यारे अविभावकों…”
छोड़िये यह सब! फागुन ने गर्दा उड़ा दिया है। इस महीने में जब प्रकृति ही गर्दा उड़ाती फिरती है तो मानुस क्यों न उड़ाए… मैं भी सोच रहा हूँ कि काश! मास्टर न होता तो राह चलती किसी भउजाई को कोई हड़ाह गाली देता और बदले में दुगुना हड़ाह गाली पा कर तृप्त होता। पर सबको सबकुछ कहाँ मिलता है साहब? कुछ मिलता है तो कुछ खो जाता है। जैसे मोदी जी का समर्थक होने पर महंगाई का विरोध करने का अधिकार समाप्त हो जाता है, या राहुलवादी होते ही बकलोली को कूटनीति मानने की विवशता आ जाती है… जीवन है जी।
शरीर स्वस्थ न हो तो विचार भी अस्वस्थ हो जाते हैं। आदमी व्यंग्यकार हो जाता है। मुझे भी जुकाम हुआ है, सो मैं भी पता नहीं क्या बड़बड़ा रहा हूँ। मुझे लगता है क्रांति या आंदोलन के नाम पर होने वाली हर बकलोली किसी अस्वस्थ मनुष्य के ही दिमाग की उपज होती है।
बातों बातों में एक बात छूट गयी थी, एक मेरा भी प्राइवेट स्कूल है। पर उसकी गाड़ी में भोंपू नहीं है। मैं अविभावकों से कहता हूं कि आप अपने बच्चे को इसलिए भी यहाँ भेज सकते हैं कि यह स्कूल भोंपू नहीं बजाता।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज बिहार।

*लेखक जाने माने स्तंभकार, कहानीकार, व्यंगकार और साहित्यकार हैं

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