मायावती ने 14 साल बाद एक बार फिर खेला ब्राह्मण कार्ड!

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बहुजन समाज पार्टी 2007 के फार्मूले को एक बार फिर से आजमाने जा रही है।
2007 की तरह क्या एक बार से बनेगा समीकरण, ब्राह्मण कार्ड खेलकर क्या 2022 में मायावती बन पाएंगी उत्तर प्रदेश की मुखिया! या फिर एक बार फिर से भाजपा बनाएगी सरकार?

देश सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश उत्तर प्रदेश की गद्दी के लिए आखिर ब्राह्मणों का वोट क्यों है जरूरी ?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों का हमेशा दबदबा रहा है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण 13% है और कहा ये जाता है कि ये 13 में से 10% भी जिस खेमे में जाता है उत्तर प्रदेश की सत्ता उसके पास चली जाती है।
कुछ विधानसभा सीटें ऐसी भी हैं जिनपर ब्राह्मण वोटर 20% से भी ज्यादा है। बलराम, बस्ती, संत कबीरनगर, गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, कानपुर, चंदौली, प्रयागराज आदि जिलों में 15 से 20% ब्राह्मण वोटर हैं। इन जिलों में ब्राह्मण वोटर की अहम भूमिका रहती है।

2007 में मायावती ने दलित,मुस्लिम और ब्राह्मण के समीकरण पर चुनाव लड़ा था जिसमें उन्हें सफलता मिली थी। 2007 में बसपा ने 86 ब्राह्मणों को चुनाव मैदान में उतारा था। जिसके दम पर ब्राह्मणों ने भी दिल खोलकर बसपा को वोट किया था। बसपा प्रमुख 2022 मेंएक बार फिर से यही दाँव खेलने जा रही हैं।
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों ने 2007 में दूसरी बार कांग्रेस भाजपा से इतर किसी दल को वोट दिया था। पहली बार जनेश्वर मिश्र के चलते ब्राह्मण समाजवादी पार्टी से जुड़े थे। लेकिन 2012 में न तो मायावती ब्राह्मणों को अपने साथ रख पाईं और न ही 2017 में अखिलेश यादव ब्राह्मणों को साथ रख पाए।
पिछले ढाई तीन वर्षों से ब्राह्मण योगी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार से भी नाराज बताये जा रहे हैं। नारागजी के कई तर्क दिए जा रहे हैं। पहला- योगी मंत्रिमंडल में ब्राह्मणों को तरजीह नही दी जा रही है। दूसरा- उत्तर प्रदेशमें हुए इंकॉउंटर्स में सबसे ज्यादा ब्राह्मण ही मारे गए। तीसरा- अफ़सरो की नियुक्ति में भी ब्राह्मणों के साथ भेदभाव के आरोप लगाए गए। चौथा- योगी सरकार के दौरान ब्राह्मणों पर ही सबसे ज्यादा मुकदमे दर्ज किये गए।
इन मुद्दों के सहारे विपक्ष योगी को ब्राह्मण विरोधी बताकर लगातार प्रचार कर रहा है। सपा भी ब्राह्मणों को अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास कर रही हैं। सपा की नजर यादव, कुर्मी, मुस्लिम और ब्राह्मण गठजोड़ करके सत्ता में काबिज होने पर है। तो वहीं कांग्रेस भी एक बार फिर से उसके कोर वोटर रहे ब्राह्मणों को मनाने के लिए पुरजोर प्रयास कर रही है। प्रमोद तिवारी और ललितेशपति त्रिपाठी जैसे बड़े नेताओं को कांग्रेस ने ब्राह्मणों को कांग्रेस से जोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी है।
अब देखने वाली बात ये है कि उत्तर प्रदेश का ये निर्णायक वोटर आखिर किस ओर जाता है।

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